गुरुवार 5 नवंबर 2026 - 20:27
आयतुल्लाह आराफ़ी के प्रचारकों को चार अहम निर्देश, जनता की समस्याओं और युवाओं पर ध्यान देने पर ज़ोर

ईरान के हौज़ा इल्मिया के प्रमुख आयतुल्लाह अली रज़ा अराफी ने अय्यामे फ़ातिमिया के अवसर पर धर्मगुरुओं, प्रचारकों और सांस्कृतिक कार्यकर्ताओं को चार अहम निर्देश देते हुए हज़रत फ़ातिमा ज़हरा (स.) की सीरत को समाज में परिचित कराने, युवा पीढ़ी की समस्याओं को समझने, जनता की जायज़ मांगों का समर्थन करने और देश की आर्थिक एवं सांस्कृतिक समस्याओं के समाधान पर ज़ोर दिया है।

हौज़ा न्यूज़ एजेंसी की रिपोर्ट के अनुसार, ईरान के हौज़ा इल्मिया के प्रमुख आयतुल्लाह अली रज़ा अराफी ने अय्यामे फ़ातिमिया के अवसर पर जारी अपने संदेश में हज़रत फ़ातिमा ज़हरा (स.) की शहादत पर पूरी उम्मते मुस्लिमः, विशेष रूप से ईरान की जनता, विद्वानों और हौज़ा इल्मिया से जुड़े लोगों के प्रति संवेदना व्यक्त की। साथ ही उन्होंने प्रचारकों को उनके प्रचार संबंधी दायित्वों की ओर ध्यान दिलाया।

अपने पहले निर्देश में उन्होंने हज़रत फ़ातिमा ज़हरा (स.) की सीरत की रोशनी में मुस्लिम महिलाओं के वास्तविक स्थान और भूमिका को स्पष्ट करने पर ज़ोर दिया। उनका कहना था कि आज के दौर में महिलाओं के जीवन के लिए इस्लाम द्वारा प्रस्तुत तीसरे आदर्श को समाज के सामने पेश करना सांस्कृतिक कार्यकर्ताओं और प्रचारकों की एक महत्वपूर्ण ज़िम्मेदारी है। समाज के पुरुषों, महिलाओं और युवाओं को अपने व्यक्तिगत, पारिवारिक, सामाजिक और राजनीतिक जीवन में सीरते फ़ातिमी से मार्गदर्शन प्राप्त करना चाहिए।

दूसरे निर्देश में उन्होंने जनसभाओं और रैलियों में लोगों की बढ़ती भागीदारी को जारी रखने और उसे और अधिक मज़बूत बनाने की आवश्यकता पर ज़ोर दिया। उन्होंने कहा कि शहीदों और शहीद रहबर के खून का बदला लेने, देश के पुनर्निर्माण, वैज्ञानिक एवं आर्थिक विकास, राजनीतिक और सैन्य शक्ति बढ़ाने तथा सशस्त्र बलों और मोर्चे-ए-मुक़ावमत का समर्थन करने जैसे विषयों को प्रचार गतिविधियों का हिस्सा बनाया जाना चाहिए। उनके अनुसार, प्रचारकों, सांस्कृतिक कार्यकर्ताओं, मीडिया और सोशल मीडिया से जुड़े लोगों को इस उद्देश्य के लिए मिलकर काम करना चाहिए।

आयतुल्लाह अराफी ने अपने तीसरे निर्देश में प्रचारकों को जनता और युवाओं के साथ निकट संपर्क बनाए रखने की हिदायत दी। उन्होंने कहा कि युवा पीढ़ी के सवालों, कठिनाइयों और आवश्यकताओं को समझना, पारिवारिक एवं सामाजिक समस्याओं से अवगत रहना, लोगों का मार्गदर्शन करना, धार्मिक सवालों के जवाब देना, उनके दुख-दर्द में शामिल होना और उनकी जायज़ मांगों का समर्थन करना धर्मगुरुओं और प्रचारकों की ज़िम्मेदारी है।

अपने चौथे निर्देश में उन्होंने देश की आर्थिक और सांस्कृतिक व्यवस्था को बेहतर बनाने की आवश्यकता पर ज़ोर देते हुए कहा कि प्रचार गतिविधियों के प्रभावी परिणामों के लिए सरकारी व्यवस्था और नीतियों में सुधार ज़रूरी है। उन्होंने सरकार के तीनों अंगों तथा आर्थिक और सांस्कृतिक क्षेत्रों से जुड़े संस्थानों से आग्रह किया कि वे जनता और युवाओं की समस्याओं के समाधान, देश की प्रगति और दुश्मनों की साज़िशों का मुकाबला करने के लिए और अधिक प्रयास करें तथा किसी भी परिस्थिति में कमज़ोरी या निष्क्रियता का प्रदर्शन न करें।

अंत में आयतुल्लाह अराफी ने घोषणा की कि मरजाए किराम, हौज़ा इल्मिया की उच्च परिषद और संबंधित संस्थानों से विचार-विमर्श के बाद क़ुम में सतह और ख़ारिज के दर्स के अलावा विशेष अध्ययन केंद्रों में बुधवार, पहली जमादिउस्सानी (20 आबान) से रविवार, पाँच जमादिउस्सानी (24 आबान) तक पाँच दिनों की छुट्टी रहेगी, ताकि विद्यार्थी और विद्वान अय्यामे फ़ातिमिया के अवसर पर प्रचार गतिविधियों में भाग ले सकें। अन्य प्रांतों और हौज़ा इल्मिया के प्रारंभिक पाठ्यक्रमों की छुट्टियों तथा प्रचार कार्यक्रमों की व्यवस्था की ज़िम्मेदारी संबंधित अधिकारियों को सौंपी गई है।

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